बिना अनुमति मणिपुर में जा भी नहीं सकेंगे भारतीय, जानें क्यों

मणिपुर (Manipur) में इनर लाइन परमिट लागू कर दिया गया है. इनर लाइन परमिट ( inner line permit)  एक यात्रा दस्तावेज़ है, जिसे भारत सरकार (अपने नागरिकों के लिए जारी करती है, ताकि वो किसी संरक्षित क्षेत्र में निर्धारित अवधि के लिए यात्रा कर सकें. यानि अब अगर भारत के किसी हिस्से से कोई मणिपुर जाता है, तो वहां तब तक नहीं जा सकता जब तक कि उसको इसकी अनुमति नहीं मिल जाए. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (President President Ram Nath Kovind) ने इस आदेश पर आज दस्तखत कर दिये.

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए इनर लाइन परमिट कोई नया शब्द नहीं है. अंग्रेज़ों के शासन काल में सुरक्षा उपायों और स्थानीय जातीय समूहों के संरक्षण के लिए वर्ष 1873 के रेग्यूलेशन में इसका प्रावधान किया गया था.

अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मिजोरम (Arunachal Pradesh, Nagaland and Mizoram ) के बाद मणिपुर चौथा राज्य है जहां इनर लाइन परमिट यानि आईएलपी लागू हो गया है.औपनिवेशिक भारत में, वर्ष 1873 के बंगाल-ईस्टर्न फ्रंटियर रेग्यूलेशन एक्ट में ब्रितानी हितों को ध्यान में रखकर ये कदम उठाया गया था जिसे आज़ादी के बाद भारत सरकार ने कुछ बदलावों के साथ कायम रखा था.
फिलहाल पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों में इनर लाइन परमिट लागू नहीं होता है. इनमें असम, त्रिपुरा और मेघालय शामिल हैं. हालांकि पूर्वोत्तर के राज्यों में इसकी मांग के समर्थन में आवाज़ें उठती रही हैं.


लंबे समय से हो रही थी ये मांग 
नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन की ये मांग रही है कि पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में इनर लाइन परमिट व्यवस्था लागू की जाए.


पिछले ही साल मणिपुर में इस आशय का एक विधेयक पारित किया गया था जिसमें 'गैर-मणिपुरी' और 'बाहरी' लोगों पर राज्य में प्रवेश के लिए कड़े नियमों की बात कही गई थी.

वर्ष 1971 के मुक्ति-संग्राम के बाद बांग्लादेश से बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक भागकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में पहुंचे थे. उसके बाद पूर्वोत्तर राज्यों में इनर लाइन परमिट की मांग को बल मिला था.

नागरिकता संशोधन विधेयक लागू नहीं
साथ ही मणिपुर को एक राहत ये भी दी गई है कि वहां नागरिकता संशोधन विधेयक लागू नहीं होगा, क्योंकि वो भारतीय संविधान की छठीं अनुसूची में आने वाले वाला पूर्वोत्तर भारत का राज्य है.छठीं अनूसूची में पूर्वोत्तर भारत के असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम राज्य हैं जहां संविधान के मुताबिक स्वायत्त ज़िला परिषदें हैं जो स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 में इसका प्रावधान किया गया है. संविधान सभा ने 1949 में इसके ज़रिए स्वायत्त ज़िला परिषदों का गठन करके राज्य विधानसभाओं को संबंधित अधिकार प्रदान किए थे.

छठीं अनूसूची में इसके अलावा क्षेत्रीय परिषदों का भी उल्लेख किया गया है. इन सभी का उद्देश्य स्थानीय आदिवासियों की सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना है.

नहीं मिलेंगे इन राज्यों में ये अधिकार
इसका मतलब ये हुआ कि अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से 31 दिसंबर 2014 से पहले आए हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन और ईसाई यानी गैर-मुसलमान शरणार्थी भारत की नागरिकता हासिल करके भी असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम में किसी तरह की ज़मीन या क़ारोबारी अधिकार हासिल नहीं कर पाएंगे.


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